आईसीएआर की समिति ने खेती में कीट-पतंगों, रोबोट एवं ड्रोन तकनीक पर अनुसंधान की दी सलाह

By PTI | New Delhi | Updated: Jun 7 2019 8:40PM

जबलपुर (मध्यप्रदेश), सात जून (भाषा) भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम समीक्षा समिति ने देश में कृषि से संबंधित पोस्टग्रेजुएट व पीएचडी पाठ्यक्रम में खाने योग्य कीट-पतंगों एवं चिकित्सा में उनके उपयोग पर अनुसंधान करने की सलाह दी है।

इसके अलावा, इस समिति ने इन दोनों पाठ्यक्रमों में रोबोट एवं ड्रोन तकनीक को भी शामिल करने की सिफारिश की है, ताकि खेती पर बेहतर निगरानी रखे जा सके।

इस उच्च स्तरीय समिति में सात सदस्य हैं, जो सभी कृषि विशेषज्ञ हैं। इस समिति ने जबलपुर में सरकारी जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में हाल ही में आयोजित बैठक में इस विषय पर विस्तृत चर्चा कर अपनी सिफारिश पिछले सप्ताह आईसीएआर को सौंप दी है।

इस कमेटी में डॉ. एस लिंगराजू एस, डॉ. ए रहमान, डॉ. बी ए पटेल, डॉ. के टी रंगास्वामी, डॉ. मकरंद जोशी, डॉ. एस स्वामीनाथन और डॉ. ए के भौमिक शामिल हैं।

इस कमेटी के एक सदस्य ने बताया, ‘‘अब गेंद आईसीएआर के पाले में है कि वह हमारी इन सिफारिशों को देश के कृषि से जुड़े हुए उच्च स्तरीय पाठ्यक्रमों में शामिल करे।’’

इस समिति के संयोजक डॉ. ए के भौमिक ने ‘पीटीआई-भाषा’ को शुक्रवार को बताया, ‘‘कुछ कीट-पतंगों की प्रजातियों में प्रोटीन की मात्रा बहुत होती है। इन्हें देश के उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिण के कुछ इलाकों में खाया जाता है। हमारी आबादी का कुछ हिस्सा खाने योग्य कीट-पतंगों जैसे टिड्डे, दीमक एवं कैटरपिलर को खाते हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मधुमक्खी का डंक भी गठिया, अवसाद एवं मिरगी रोग के उपचार के लिए फायदेमंद होता है। इसका उपयोग इन बीमारियों के उपचार हेतु किया जा सकता है।’’

भौमिक ने बताया कि रोबोट तकनीक का उपयोग फसल कटाई एवं खरपतवार को नियंत्रण करने के साथ-साथ खेती से जुड़े अन्य कामों में लिया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि बड़े-बड़े खेतों में ड्रोन से फसलों की निगरानी करने में मदद ली जा सकती है। इसके अलावा, ड्रोन का उपयोग फसलों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के भी किया जा सकता है।

भाषा सं रावत

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